छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सामाजिक समरसता को लेकर नया विवाद छिड़ गया है। कोंटा के कथित क्रांतिवीर और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने हाल ही में एक सार्वजनिक भाषण में बस्तर से बंगालियों को भगाने की बात कही थी, जिसके बाद निखिल भारतीय समन्वय समिति के बंगाली समाज संभागीय अध्यक्ष जीवानंद हालदार ने उनको कड़ा खुला पत्र लिखकर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
जीवानंद हालदार ने पत्र में कहा कि अपराध किसी व्यक्ति का होता है, न कि पूरे समुदाय का। उन्होंने लिखा, "90 के दशक में किसी बंगाली द्वारा लड़की बेचने का हवाला देकर पूरे बंगाली समुदाय को दोषी ठहराना गलत है। लड़की भगाना, दुष्कर्म, हत्या या कोई भी अपराध बंगाली, बिहारी, मारवाड़ी, ब्राह्मण या आदिवासी समुदाय का किया हो, लेकिन वह सिर्फ 'अपराधी' है, समाज नहीं।"
हालदार ने आगे कहा कि बंगाली समुदाय ने देश और बस्तर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए लिखा, "देश में गोरों पर पहली गोली बंगाली खुदीराम बोस ने चलाई थी। पहली बगावत बंगाली सुभाष चंद्र बोस ने की। रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर सैकड़ों बंगालियों ने देश निर्माण में योगदान दिया। बस्तर में बंगाली समुदाय ने खेती-किसानी और मूलवासियों को सिखाया है। उनके लिए इंद्रावती भी गंगा और ब्रह्मपुत्र के समान पवित्र है।"
*'सस्ती लोकप्रियता के लिए सामाजिक जहर'*
जीवानंद हालदार ने मनीष कुंजाम पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे "दागे हुए कारतूस" हैं और सस्ती लोकप्रियता के लिए बस्तर की सामाजिक समरसता में जहर घोल रहे हैं। उन्होंने बस्तर की "गंगा-जमुनी तहजीब" को जहरीला बनाने का आरोप लगाया और कहा कि कुंजाम बस्तर को असम या मिजोरम जैसा बनाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
*हालदार ने पत्र में कई सवाल भी उठाए:*
1. शिक्षित नेता मनीष कुंजाम को अंगूठा छाप देहाती नेता बार-बार चुनाव में क्यों हराता रहा?
2. एक लाख ग्रामीणों की रैली निकालने वाला नेता दोबारा निर्वाचित क्यों नहीं हो सका?
3. बस्तर में कम्युनिस्ट जनाधार किसने खत्म किया?
4. आदिवासियों के मसीहा बनने का दावा करने वाले कुंजाम बंगाली-मारवाड़ी पर शोषण का आरोप लगा रहे हैं, तो आरक्षित लोकसभा-विधानसभा सीटों पर पसे आदिवासी नेता गूंगे-बहरे क्यों हैं?
*पृष्ठभूमि*
मनीष कुंजाम, जो कभी सीपीआई से जुड़े रहे और अब बस्तरिया राज मोर्चा चला रहे हैं, बस्तर में आदिवासी अधिकारों और नक्सलवाद विरोधी मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। हालांकि, इस भाषण ने क्षेत्र में बंगाली समुदाय जो मुख्यतः व्यापार, कृषि और अन्य व्यवसायों से जुड़े हैं में रोष पैदा किया है।
यह घटना बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सामाजिक सद्भाव पर सवाल खड़े करती है, जहां आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदायों के बीच पहले से ही तनाव देखा जाता रहा है।
प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है। जीवानंद हालदार ने पत्र के जरिए समुदाय से एकजुट रहने और ऐसे बयानों का विरोध करने की अपील की है।
